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[PDF] Surah Waqiah in Hindi | Surah Waqiah Benefits in Hindi

Surah-Waqiah-in-Hindi


(Surah Waqiah in Hindi) सूरह अल-वाक़िया एक मक्की सूरह है जो मक्का में नाजिल हुई थी। इसमें 96 आयात हैं और यह पवित्र कुरान का 56वीं सूरह है।

अरबी शब्द अल-वाक़िया का अर्थ है "न गुजीर या अटल"

कुरआन मजीद मोमिनो के लिए सीधा रास्ता दिखाने बाली किताब है क्योंकि यह हमें अल्लाह के बताये नियमों और आदेशों के अनुसार अपना जीवन जीना सिखाती है।

जैसा कि हम सभी जानते है कि मुसलमान दुनिया के अलग-अलग देशों में रहते हैं इसी कारण से कुरान मजीद का अब कई भाषाओं में अनुवाद किया जाता है।

यह पोस्ट हमने खासकर उन लोगों के लिए लिखी है जो सूरह वक़िया हिंदी पीडीएफ और Surah Waqiah Full Image को पढ़ना या डाउनलोड करना चाहते हैं।

अगर आप भी एक ऐसे सख्श है की आपको हिंदी भाषा अच्छी तरह आती है और आप उर्दू में कमज़ोर है तो आपके लिए सूरह वाकिया का हिंदी अनुवाद पीडीएफ  में डाउनलोड करना बेहतर होगा।

हालांकि, इस सूरह वाकिया की पीडीऍफ़ डाउनलोड करने से आपको यह फायदा होगा कि आप कभी भी बिना इन्टरनेट के इसे पढ़ सकिंगे।

आपको बता दें इस पोस्ट में सूरह वाकिया हिंदी में ही मौजूद नही है अगर आप अरबी,उर्दू या इंग्लिश जानते है तो आपके लिए हमने सूरह वाकिया को अरबी,उर्दू और इंग्लिश में उसके अनुवाद के साथ उपलब्ध कराया है।




    Surah Waqiah in Hindi with Hindi Translation



    सूरह अल वाकिया हिंदी में तर्जुमा के साथ


    बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
    अल्लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है

    इज़ा व – क़ – अ़तिल् – वाकि – अतु (1)
    जब क़यामत बरपा होगी और उसके वाक़िया होने में ज़रा झूट नहीं

    लै – स लिवक्अ़तिहा काज़िबह् • (2)
    उस वक्त लोगों में फ़र्क ज़ाहिर होगा

    खाफ़ि – ज़तुर – राफ़ि – अः (3)
    कि किसी को पस्त करेगी किसी को बुलन्द

    इज़ा रुज्जतिल् – अर्जु रज्जंव्- (4)
    जब ज़मीन बड़े ज़ोरों में हिलने लगेगी

    व बुस्सतिल् – जिबालु बस्सा (5)
    और पहाड़ (टकरा कर) बिल्कुल चूर चूर हो जाएँगे

    फ़ – कानत् हबा – अम् मुम् – बस्संव – (6)
    फिर ज़र्रे बन कर उड़ने लगेंगे

    व कुन्तुम् अज़्वाजन् सलासः (7)
    और तुम लोग तीन किस्म हो जाओगे

    फ़ – अस्हाबुल् -मैमनति मा अस्हाबुल – मै – मनः (8)
    तो दाहिने हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (वाह) दाहिने हाथ वाले क्या (चैन में) हैं

    व अस्हाबुल् – मश् – अ – मति मा अस्हाबुल – मश् – अमः (9)
    और बाएं हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (अफ़सोस) बाएं हाथ वाले क्या (मुसीबत में) हैं

    वस्साबिकू नस् – साबिकून (10)
    और जो आगे बढ़ जाने वाले हैं (वाह क्या कहना) वह आगे ही बढ़ने वाले थे

    उलाइ – कल् – मुकर्रबून (11)
    यही लोग (ख़ुदा के) मुक़र्रिब हैं

    फी जन्नातिन् – नअ़ीम (12)
    आराम व आसाइश के बाग़ों में बहुत से

    सुल्लतुम् – मिनल् – अव्वलीन (13)
    तो अगले लोगों में से होंगे

    व क़लीलुम् मिनल – आख़िरीन (14)
    और कुछ थोडे से पिछले लोगों में से मोती

    अ़ला सुरुरिम् – मौजूनतिम्- (15)
    और याक़ूत से जड़े हुए सोने के तारों से बने हुए

    मुत्तकिई – न अ़लैहा मु – तकाबिलीन (16)
    तख्ते पर एक दूसरे के सामने तकिए लगाए (बैठे) होंगे

    यतूफु अ़लैहिम् विल्दानुम् – मु – ख़ल्लदून (17)
    नौजवान लड़के जो (बेहिश्त में) हमेशा (लड़के ही बने) रहेंगे

    बिअक्वाबिंव् – व अबारी – क़ व कअ्सिम् – मिम् – मअ़ीन (18)
    (शरबत वग़ैरह के) सागर और चमकदार टोंटीदार कंटर और शफ्फ़ाफ़ शराब के जाम लिए हुए उनके पास चक्कर लगाते होंगे

    ला युसद् – दअू – न अ़न्हा व ला युन्ज़िफून (19)
    जिसके (पीने) से न तो उनको (ख़ुमार से) दर्दसर होगा और न वह बदहवास मदहोश होंगे

    व फ़ाकि – हतिम् – मिम्मा य – तख़य्यरून (20)
    और जिस क़िस्म के मेवे पसन्द करें

    व लह़्मि तैरिम् – मिम्मा यश्तहून (21)
    और जिस क़िस्म के परिन्दे का गोश्त उनका जी चाहे (सब मौजूद है)

    व हुरुन् अी़न (22)
    और बड़ी बड़ी ऑंखों वाली हूरें

    क – अम्सालिल् – लुअलुइल् – मक्नून (23)
    जैसे एहतेयात से रखे हुए मोती

    जज़ा – अम् बिमा कानू यअ्मलून (24)
    ये बदला है उनके (नेक) आमाल का

    ला यस्मअू – न फ़ीहा लग्वंव् – व ला तअ्सीमा (25)
    वहाँ न तो बेहूदा बात सुनेंगे और न गुनाह की बात

    इल्ला की़लन् सलामन् सलामा (26)
    (फहश) बस उनका कलाम सलाम ही सलाम होगा

    व अस्हाबुल् – यमीनि मा अस्हाबुल् – यमीन (27)
    और दाहिने हाथ वाले (वाह) दाहिने हाथ वालों का क्या कहना है

    फी सिद्रिम् – मख़्जूदिंव् – (28)
    बे काँटे की बेरो और लदे गुथे हुए

    व तल्हिम् – मनजूदिंव् – (29)
    केलों और लम्बी लम्बी छाँव

    व ज़िल्लिम् मम्दूदिंव् – (30)
    और झरनो के पानी

    व माइम् – मस्कूब (31)
    और अनारों

    व फ़ाकि – हतिन् कसी – रतिल् – (32)
    मेवो में होंगें

    ला मक्तू – अ़तिंव् – व ला मम्नू – अ़तिंव् (33)
    जो न कभी खत्म होंगे और न उनकी कोई रोक टोक

    व फुरुशिम् – मरफूअः (34)
    और ऊँचे ऊँचे (नरम गद्दो के) फ़र्शों में (मज़े करते) होंगे

    इन्ना अन्शअ्नाहुन् – न इन्शा – अन् (35)
    (उनको) वह हूरें मिलेंगी जिसको हमने नित नया पैदा किया है

    फ़ – जअ़ल्नाहुन् – न अब्कारन् (36)
    तो हमने उन्हें कुँवारियाँ प्यारी प्यारी हमजोलियाँ बनाया

    अुरुबन् अत्राबल्- (37)
    ये सब सामान

    लिअस्हाबिल् – यमीन (38)*
    दाहिने हाथ (में नामए आमाल लेने) वालों के वास्ते है

    सुल्लतुम् – मिनल् – अव्वलीन (39)
    (इनमें) बहुत से तो अगले लोगों में से

    व सुल्लतुम् – मिनल् – आख़िरीन (40)
    और बहुत से पिछले लोगों में से

    व अस्हाबुशु – शिमालि मा अस्हाबुश् – शिमाल (41)
    और बाएं हाथ (में नामए आमाल लेने) वाले (अफसोस) बाएं हाथ वाले क्या (मुसीबत में) हैं

    फ़ी समूमिंव् – व हमीमिंव् – (42)
    (दोज़ख़ की) लौ और खौलते हुए पानी

    व ज़िल्लिम् – मिंय्यह्मूमिल् – (43)
    और काले सियाह धुएँ के साये में होंगे

    ला बारिदिंव् – व ला करीम (44)
    जो न ठन्डा और न ख़ुश आइन्द

    इन्नहुम् कानू क़ब् – ल ज़ालि – क मुत् – रफ़ीन (45)
    ये लोग इससे पहले (दुनिया में) ख़ूब ऐश उड़ा चुके थे

    व कानू युसिर्रू – न अ़लल् – हिन्सिल् – अ़ज़ीम (46)
    और बड़े गुनाह (शिर्क) पर अड़े रहते थे

    व कानू यकूलू – न अ – इज़ा मित्ना व कुन्ना तुराबंव् – व अ़िज़ामन् अ – इन्ना ल – मब्अूसून (47)
    और कहा करते थे कि भला जब हम मर जाएँगे और (सड़ गल कर) मिटटी और हडिडयाँ (ही हडिडयाँ) रह जाएँगे

    अ – व आबाउनल् – अव्वलून (48)
    तो क्या हमें या हमारे अगले बाप दादाओं को फिर उठना है

    कुल् इन्नल् – अव्वली – न वल् – आख़िरीन (49)
    (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगले और पिछले

    ल – मज्मूअू – न इला मीकाति यौमिम् – मअ्लूम (50)
    सब के सब रोजे मुअय्यन की मियाद पर ज़रूर इकट्ठे किए जाएँगे

    सुम् – म इन्नकुम अय्युहज़्जा़ल्लूनल् – मुकज़्ज़िबून (51)
    फिर तुमको बेशक ऐ गुमराहों झुठलाने वालों

    ल – आकिलू – न मिन् श – जरिम् – मिन् ज़क़्कूम (52)
    यक़ीनन (जहन्नुम में) थोहड़ के दरख्तों में से खाना होगा

    फ़मालिऊ – न मिन्हल् – बुतून (53)
    तो तुम लोगों को उसी से (अपना) पेट भरना होगा

    फ़शारिबू – न अ़लैहि मिनल् – हमीम (54)
    फिर उसके ऊपर खौलता हुआ पानी पीना होगा

    फ़शारिबू – न शुर्बल् – हीम (55)
    और पियोगे भी तो प्यासे ऊँट का सा (डग डगा के) पीना

    हाज़ा नुजुलुहुम् यौमद्दीन (56)
    क़यामत के दिन यही उनकी मेहमानी होगी

    नह्नु ख़लक़्नाकुम् फ़लौ ला तुसद्दिकून (57)
    तुम लोगों को (पहली बार भी) हम ही ने पैदा किया है

    अ – फ़ – रऐतुम् – मा तुम्नून (58)
    फिर तुम लोग (दोबार की) क्यों नहीं तस्दीक़ करते

    अ – अन्तुम् तखलुकूनहू अम् नह्नुल – ख़ालिकून (59)
    तो जिस नुत्फे क़ो तुम (औरतों के रहम में डालते हो) क्या तुमने देख भाल लिया है क्या तुम उससे आदमी बनाते हो या हम बनाते हैं

    नह्नु कद्दरना बैनकुमुल् – मौ – त व मा नह्नु बिमसबूक़ीन (60)
    हमने तुम लोगों में मौत को मुक़र्रर कर दिया है और हम उससे आजिज़ नहीं हैं

    अ़ला अन् – नुबद्दि – ल अम्सा – लकुम् व नुन्शि – अकुम् फ़ी मा ला तअ्लमून (61)
    कि तुम्हारे ऐसे और लोग बदल डालें और तुम लोगों को इस (सूरत) में पैदा करें जिसे तुम मुत्तलक़ नहीं जानते

    व ल – क़द् अ़लिम्तुमुन् – नश्अ – तल् ऊला फ़लौ ला तज़क्करून (62)
    और तुमने पैहली पैदाइश तो समझ ही ली है (कि हमने की) फिर तुम ग़ौर क्यों नहीं करते

    अ – फ़ – रऐतुम् – मा तहरुसून (63)
    भला देखो तो कि जो कुछ तुम लोग बोते हो क्या

    अ – अन्तुम् तज् – रअूनहू अम् नह्नुज् – ज़ारिअून (64)
    तुम लोग उसे उगाते हो या हम उगाते हैं अगर हम चाहते

    लौ नशा – उ ल – जअ़ल्नाहु हुतामन् फ़ज़ल्तुम् तफ़क्कहून (65)
    तो उसे चूर चूर कर देते तो तुम बातें ही बनाते रह जाते

    इन्ना ल – मुग़रमून (66)
    कि (हाए) हम तो (मुफ्त) तावान में फॅसे (नहीं)

    बल् नह्नु महरूमून (67)
    हम तो बदनसीब हैं

    अ – फ – रऐतुमुल् मा अल्लज़ी तश्रबून (68)
    तो क्या तुमने पानी पर भी नज़र डाली जो (दिन रात) पीते हो

    अ – अन्तुम् अन्ज़ल्तुमूहु मिनल् – मुज्नि अम् नह्नुल – मुन्ज़िलून (69)
    क्या उसको बादल से तुमने बरसाया है या हम बरसाते हैं

    लौ नशा – उ जअ़ल्लाहु उजाजन् फ़लौ ला तश्कुरून (70)
    अगर हम चाहें तो उसे खारी बना दें तो तुम लोग यक्र क्यों नहीं करते

    अ – फ़ – रऐतुमुन् – नारल्लती तूरून (71)
    तो क्या तुमने आग पर भी ग़ौर किया जिसे तुम लोग लकड़ी से निकालते हो

    अ – अन्तुम् अन्शअ्तुम् श – ज – र – तहा अम् नह्नुल – मुन्शिऊन (72)
    क्या उसके दरख्त को तुमने पैदा किया या हम पैदा करते हैं

    नह्नु जअ़ल्नाहा तज़्कि – रतंव् – व मताअ़ल् – लिल्मुक़्वीन (73)
    हमने आग को (जहन्नुम की) याद देहानी और मुसाफिरों के नफे के (वास्ते पैदा किया)

    फ़ – सब्बिह् बिस्मि रब्बिकल् – अ़ज़ीम • (74)*
    तो (ऐ रसूल) तुम अपने बुज़ुर्ग परवरदिगार की तस्बीह करो

    फ़ला उक्सिमु बि – मवाकिअिन् – नुजूम (75)
    तो मैं तारों के मनाज़िल की क़सम खाता हूँ

    व इन्नहू ल – क़ – समुल् – लौ तअ्लमू – न अ़ज़ीम (76)
    और अगर तुम समझो तो ये बड़ी क़सम है

    इन्नहू ल – कुरआनुन् करीम (77)
    कि बेशक ये बड़े रूतबे का क़ुरान है

    फी किताबिम् मक्नून (78)
    जो किताब (लौहे महफूज़) में (लिखा हुआ) है

    ला य – मस्सुहू इल्लल् – मुतह्हरून (79)
    इसको बस वही लोग छूते हैं जो पाक हैं

    तन्ज़ीलुम् मिर्रब्बिल् – आ़लमीन (80)
    सारे जहाँ के परवरदिगार की तरफ से (मोहम्मद पर) नाज़िल हुआ है

    अ – फ़बिहाज़ल् – हदीसि अन्तुम् मुद्हिनून (81)
    तो क्या तुम लोग इस कलाम से इन्कार रखते हो

    व तज्अ़लू – न रिज् – क़कुम् अन्नकुम् तुकज़्ज़िबून (82)
    और तुमने अपनी रोज़ी ये करार दे ली है कि (उसको) झुठलाते हो

    फ़लौ ला इज़ा ब – ल – गतिल् – हुल्कूम (83)
    तो क्या जब जान गले तक पहुँचती है

    व अन्तुम् ही – न – इज़िन् तन्जुरून (84)
    और तुम उस वक्त (क़ी हालत) पड़े देखा करते हो

    व नह्नु अक्रबु इलैहि मिन्कुम् व लाकिल् – ला तुब्सिरून (85)
    और हम इस (मरने वाले) से तुमसे भी ज्यादा नज़दीक होते हैं लेकिन तुमको दिखाई नहीं देता

    फ़लौ – ला इन् कुन्तुम् गै़ – र मदीनीन (86)
    तो अगर तुम किसी के दबाव में नहीं हो

    तरजिअूनहा इन् कुन्तुम् सादिक़ीन (87)
    तो अगर (अपने दावे में) तुम सच्चे हो तो रूह को फेर क्यों नहीं देते

    फ़ – अम्मा इन का – न मिनल् – मुक़र्रबीन (88)
    पस अगर वह (मरने वाला ख़ुदा के) मुक़र्रेबीन से है

    फ़ – रौहुंव् – व रैहानुंव् – व जन्नतु नअ़ीम (89)
    तो (उस के लिए) आराम व आसाइश है और ख़ुशबूदार फूल और नेअमत के बाग़

    व अम्मा इन् का – न मिन् अस्हाबिल् – यमीन (90)
    और अगर वह दाहिने हाथ वालों में से है

    फ़ – सलामुल् – ल – क मिन् अस्हाबिल् – यमीन (91)
    तो (उससे कहा जाएगा कि) तुम पर दाहिने हाथ वालों की तरफ़ से सलाम हो

    व अम्मा इन् का – न मिनल् मुकज़्ज़िबीनज् -ज़ाल्लीन (92)
    और अगर झुठलाने वाले गुमराहों में से है

    फ़ – नुजुलुम् – मिन् हमीमिंव् – (93)
    तो (उसकी) मेहमानी खौलता हुआ पानी है

    व तस्लि – यतु जहीम (94)
    और जहन्नुम में दाखिल कर देना

    इन् – न हाज़ा लहु – व हक़्कुल – यक़ीन (95)
    बेशक ये (ख़बर) यक़ीनन सही है

    फ़ – सब्बिह् बिस्मि रब्बिकल् – अ़ज़ीम (96)*
    तो (ऐ रसूल) तुम अपने बुज़ुर्ग परवरदिगार की तस्बीह करो





    Surah Waqiah Hindi Full Images

    यहाँ आपको हमने Surah Waqiah Full Image उपलब्ध कराये है, अगर आप इन्हें अपने फ़ोन में सेव करना चाहते है तो इमेज पर क्लिक करके सेव कर सकते हैं


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    Surah Waqiah Hindi Pdf Download


    मेरे प्यारे दीनी भाइयों और बहनों जैसा की आपने ऊपर सूरह वाकिया को हिंदी में तर्जुमा के साथ पढ़ा ही होगा। साथ ही साथ आपने Surah Waqia की हिंदी इमेज भी देखी होंगी

    यहाँ हमने Surah Waqiah Hindi Pdf उपलब्ध करायी है आप आसानी के साथ सूरह वाकिया की पीडीऍफ़ को डाउनलोड कर सकते है




    यह भी पढ़ें: - Surah Ar Rahman Text Pdf



    Surah Waqiah in Arabic with Urdu Tarjuma


    بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ
    ترجمہ:اللہ کے نام سے شروع جو نہایت مہربان ، رحمت والاہے ۔

    اِذَا وَقَعَتِ الْوَاقِعَةُۙ(۱
    ترجمہ:جب واقع ہونے والی واقع ہوگی۔

    لَیْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌۘ(۲
    ترجمہ:۔ (اس وقت )اس کے واقع ہونے میں کسی کو انکار کی گنجائش نہ ہوگی۔

    خَافِضَةٌ رَّافِعَةٌۙ(۳
    ترجمہ: کسی کو نیچاکرنے والی،کسی کو بلندی دینے والی ۔

    اِذَا رُجَّتِ الْاَرْضُ رَجًّاۙ(۴
    ترجمہ:جب زمین بڑے زور سے ہلا دی جائے گی ۔

    وَّ بُسَّتِ الْجِبَالُ بَسًّاۙ(۵
    ترجمہ:اور پہاڑ خوب چُورا چُورا کر دیئے جائیں گے ۔

    فَكَانَتْ هَبَآءً مُّنْۢبَثًّاۙ(۶
    ترجمہ: تووہ ہوا میں بکھرے ہوئے غبار جیسے ہوجائیں گے ۔


    وَّ كُنْتُمْ اَزْوَاجًا ثَلٰثَةًؕ(۷
    ترجمہ: اور (اے لوگو!)تم تین قسم کے ہوجاؤ گے۔

    فَاَصْحٰبُ الْمَیْمَنَةِ مَاۤ اَصْحٰبُ الْمَیْمَنَةِؕ(۸
    ترجمہ: تو دائیں جانب والے( جنَّتی) کیا ہی دائیں جانب والے ہیں ۔

    وَ اَصْحٰبُ الْمَشْــٴَـمَةِ مَاۤ اَصْحٰبُ الْمَشْــٴَـمَةِؕ(۹
    ترجمہ: اور بائیں جانب والے ( یعنی جہنمی)کیا ہی بائیں جانب والے ہیں ۔

    وَ السّٰبِقُوْنَ السّٰبِقُوْنَۚۙ(۱۰
    ترجمہ: اور آگے بڑھ جانے والے تو آگے ہی بڑھ جانے والے ہیں ۔

    اُولٰٓىٕكَ الْمُقَرَّبُوْنَۚ(۱۱
    ترجمہ: وہی قرب والے ہیں ۔

    فِیْ جَنّٰتِ النَّعِیْمِ(۱۲
    ترجمہ: نعمتوں کے باغوں میں ہیں ۔

    ثُلَّةٌ مِّنَ الْاَوَّلِیْنَۙ(۱۳
    ترجمہ: وہ پہلے لوگوں میں سے ایک بڑا گروہ ہوگا ۔

    وَ قَلِیْلٌ مِّنَ الْاٰخِرِیْنَؕ(۱۴
    ترجمہ: اور بعد والوں میں سے تھوڑے ہوں گے۔

    عَلٰى سُرُرٍ مَّوْضُوْنَةٍۙ(۱۵
    ترجمہ:۔ (جواہرات سے)جَڑے ہوئے تختوں پر ہوں گے۔

    مُّتَّكِـٕیْنَ عَلَیْهَا مُتَقٰبِلِیْنَ(۱۶
    ترجمہ: ان پر تکیہ لگائے ہوئے آمنے سامنے ۔

    یَطُوْفُ عَلَیْهِمْ وِلْدَانٌ مُّخَلَّدُوْنَۙ(۱۷
    ترجمہ:ان کے اردگردہمیشہ رہنے والے لڑکے پھریں گے۔

    بِاَكْوَابٍ وَّ اَبَارِیْقَ وَ كَاْسٍ مِّنْ مَّعِیْنٍۙ(۱۸
    ترجمہ: کوزوں اور صراحیوں اور آنکھوں کے سامنے بہنے والی شراب کے جام کے ساتھ۔

    لَّا یُصَدَّعُوْنَ عَنْهَا وَ لَا یُنْزِفُوْنَۙ(۱۹
    ترجمہ: اس سے نہ انہیں سردرد ہو گااور نہ ان کے ہوش میں فرق آئے گا۔

    وَ فَاكِهَةٍ مِّمَّا یَتَخَیَّرُوْنَۙ(۲۰
    ترجمہ:اور پھل میوے جو جنتی پسند کریں گے۔

    وَ لَحْمِ طَیْرٍ مِّمَّا یَشْتَهُوْنَؕ(۲۱
    ترجمہ: اور پرندوں کا گوشت جو وہ چاہیں گے۔

    وَ حُوْرٌ عِیْنٌۙ(۲۲
    ترجمہ: اور بڑی آنکھ والی خوبصورت حوریں ہیں ۔

    كَاَمْثَالِ اللُّؤْلُؤِ الْمَكْنُوْنِۚ(۲۳
    ترجمہ: جیسے چھپا کر رکھے ہوئے موتی ہوں ۔

    جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوْا یَعْمَلُوْنَ(۲۴
    ترجمہ: ان کے اعمال کے بدلے کے طور پر ۔

    لَا یَسْمَعُوْنَ فِیْهَا لَغْوًا وَّ لَا تَاْثِیْمًاۙ(۲۵
    ترجمہ: اس میں نہ کوئی بیکار با ت سنیں گے اورنہ کوئی گناہ کی بات ۔

    اِلَّا قِیْلًا سَلٰمًا سَلٰمًا(۲۶
    ترجمہ: مگر سلام سلام کہنا۔

    وَ اَصْحٰبُ الْیَمِیْنِ مَاۤ اَصْحٰبُ الْیَمِیْنِؕ(۲۷
    ترجمہ: اور دائیں جانب والے کیا دائیں جانب والے ہیں ۔

    فِیْ سِدْرٍ مَّخْضُوْدٍۙ(۲۸
    ترجمہ: بغیر کانٹے والی بیریوں کے درختوں میں ہوں گے ۔

    وَّ طَلْحٍ مَّنْضُوْدٍۙ(۲۹
    ترجمہ: اور کیلے کے گچھوں میں ۔

    وَّ ظِلٍّ مَّمْدُوْدٍۙ(۳۰
    ترجمہ: اور دراز سائے میں ۔

    وَّ مَآءٍ مَّسْكُوْبٍۙ(۳۱
    ترجمہ: اور جاری پانی میں ۔

    وَّ فَاكِهَةٍ كَثِیْرَةٍۙ(۳۲
    ترجمہ: اور بہت سے پھلوں میں ۔

    لَّا مَقْطُوْعَةٍ وَّ لَا مَمْنُوْعَةٍۙ(۳۳
    ترجمہ: جو نہ ختم ہوں گے اور نہ روکے جائیں گے۔

    وَّ فُرُشٍ مَّرْفُوْعَةٍؕ(۳۴
    ترجمہ: اور بلند بچھونوں میں ہوں گے۔

    اِنَّاۤ اَنْشَاْنٰهُنَّ اِنْشَآءًۙ(۳۵
    ترجمہ: بیشک ہم نے ان جنتی عورتوں کو ایک خاص انداز سے پیدا کیا ۔

    فَجَعَلْنٰهُنَّ اَبْكَارًاۙ(۳۶
    ترجمہ: توہم نے انہیں کنواریاں بنایا ۔

    عُرُبًا اَتْرَابًاۙ(۳۷
    ترجمہ: محبت کرنے والیاں ،سب ایک عمر والیاں ۔

    لِّاَصْحٰبِ الْیَمِیْنِ(۳۸)ﮒ
    ترجمہ: دائیں جانب والوں کے لیے۔

    ثُلَّةٌ مِّنَ الْاَوَّلِیْنَۙ(۳۹
    ترجمہ: پہلے لوگوں میں سے ایک بڑاگروہ ہے۔

    وَ ثُلَّةٌ مِّنَ الْاٰخِرِیْنَؕ(۴۰
    ترجمہ: اور بعدوالے لوگوں میں سے بھی ایک بڑاگروہ ہے۔

    وَ اَصْحٰبُ الشِّمَالِ مَاۤ اَصْحٰبُ الشِّمَالِؕ(۴۱
    ترجمہ: اور بائیں جانب والے کیا بائیں جانب والے ہیں ۔

    فِیْ سَمُوْمٍ وَّ حَمِیْمٍۙ(۴۲
    ترجمہ: شدید گرم ہوا اور کھولتے پانی میں ہوں گے۔

    وَّ ظِلٍّ مِّنْ یَّحْمُوْمٍۙ(۴۳
    ترجمہ: اورشدید سیاہ دھوئیں کے سائے میں ہوں گے ۔

    لَّا بَارِدٍ وَّ لَا كَرِیْمٍ(۴۴
    ترجمہ: جو ( سایہ) نہ ٹھنڈا ہوگا اورنہ آرام بخش۔

    اِنَّهُمْ كَانُوْا قَبْلَ ذٰلِكَ مُتْرَفِیْنَۚۖ(۴۵
    ترجمہ: بیشک وہ اس سے پہلے خوشحال تھے۔


    وَ كَانُوْا یُصِرُّوْنَ عَلَى الْحِنْثِ الْعَظِیْمِۚ(۴۶
    ترجمہ: اور بڑے گناہ پر ڈٹے ہوئے تھے۔


    وَ كَانُوْا یَقُوْلُوْنَ اَىٕذَا مِتْنَا وَ كُنَّا تُرَابًا وَّ عِظَامًا ءَاِنَّا لَمَبْعُوْثُوْنَۙ(۴۷
    ترجمہ: اور کہتے تھے: کیا جب ہم مرجائیں گے اور مٹی اور ہڈیاں ہو جائیں گے تو کیا ضرور ہم اٹھائے جائیں گے؟

    اَوَ اٰبَآؤُنَا الْاَوَّلُوْنَ(۴۸
    ترجمہ: اور کیا ہمارے پہلے باپ دادا بھی ۔

    قُلْ اِنَّ الْاَوَّلِیْنَ وَ الْاٰخِرِیْنَۙ(۴۹
    ترجمہ: تم فرماؤ: بیشک سب اگلے اور پچھلے لوگ۔

    لَمَجْمُوْعُوْنَ اِلٰى مِیْقَاتِ یَوْمٍ مَّعْلُوْمٍ(۵۰)
    ترجمہ: ضرورایک معین دن کے وقت پر اکٹھے کیے جائیں گے ۔


    ثُمَّ اِنَّكُمْ اَیُّهَا الضَّآلُّوْنَ الْمُكَذِّبُوْنَۙ(۵۱
    ترجمہ: پھر اے گمراہو، جھٹلانے والو! بیشک تم۔

    لَاٰكِلُوْنَ مِنْ شَجَرٍ مِّنْ زَقُّوْمٍۙ(۵۲
    ترجمہ: ضرور زقوم (نام)کے درخت میں سے کھاؤ گے۔

    فَمَالِــٴُـوْنَ مِنْهَا الْبُطُوْنَۚ(۵۳
    ترجمہ: پھر اس سے پیٹ بھرو گے۔

    فَشٰرِبُوْنَ عَلَیْهِ مِنَ الْحَمِیْمِۚ(۵۴
    ترجمہ: پھر اس پر کھولتا ہوا پانی پیو گے۔

    فَشٰرِبُوْنَ شُرْبَ الْهِیْمِؕ(۵۵
    ترجمہ: تو ایسے پیو گے جیسے سخت پیاسے اونٹ پیتے ہیں ۔

    هٰذَا نُزُلُهُمْ یَوْمَ الدِّیْنِؕ(۵۶
    ترجمہ: انصاف کے دن یہ ان کی مہمانی ہے ۔

    نَحْنُ خَلَقْنٰكُمْ فَلَوْ لَا تُصَدِّقُوْنَ(۵۷
    ترجمہ: ہم نے تمہیں پیدا کیا تو تم کیوں سچ نہیں مانتے؟

    اَفَرَءَیْتُمْ مَّا تُمْنُوْنَؕ(۵۸
    ترجمہ: تو بھلا دیکھو تو وہ منی جو تم گراتے ہو۔

    ءَاَنْتُمْ تَخْلُقُوْنَهٗۤ اَمْ نَحْنُ الْخٰلِقُوْنَ(۵۹
    ترجمہ: کیا تم اسے (آدمی) بناتے ہو یا ہم ہی بنانے والے ہیں ؟

    نَحْنُ قَدَّرْنَا بَیْنَكُمُ الْمَوْتَ وَ مَا نَحْنُ بِمَسْبُوْقِیْنَۙ(۶۰
    ترجمہ: ہم نے تمہارے درمیان موت مقرر کردی اور ہم پیچھے رہ جانے والے نہیں ہیں ۔

    عَلٰۤى اَنْ نُّبَدِّلَ اَمْثَالَكُمْ وَ نُنْشِئَكُمْ فِیْ مَا لَا تَعْلَمُوْنَ(۶۱
    ترجمہ: اس سےکہ تم جیسے اور بدل دیں اورتمہیں ان صورتوں میں بنادیں جن کی تمہیں خبر نہیں ۔

    وَ لَقَدْ عَلِمْتُمُ النَّشْاَةَ الْاُوْلٰى فَلَوْ لَا تَذَكَّرُوْنَ(۶۲
    ترجمہ: اور بیشک تم پہلی پیدائش جان چکے ہوتو پھر کیوں نصیحت حاصل نہیں کرتے؟

    اَفَرَءَیْتُمْ مَّا تَحْرُثُوْنَؕ(۶۳
    ترجمہ: تو بھلا بتاؤ تو کہ تم جو بوتے ہو۔

    ءَاَنْتُمْ تَزْرَعُوْنَهٗۤ اَمْ نَحْنُ الزّٰرِعُوْنَ(۶۴
    ترجمہ: کیا تم اس کی کھیتی بناتے ہو یا ہم ہی بنانے والے ہیں ؟

    لَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنٰهُ حُطَامًا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُوْنَ(۶۵
    ترجمہ: اگر ہم چاہتے تو اسے چورا چورا گھاس کردیتے پھر تم باتیں بناتے رہ جاتے۔

    اِنَّا لَمُغْرَمُوْنَۙ(۶۶
    ترجمہ: کہ ہم پر تاوان پڑگیا ہے۔

    بَلْ نَحْنُ مَحْرُوْمُوْنَ(۶۷
    ترجمہ: بلکہ ہم بے نصیب رہے۔

    اَفَرَءَیْتُمُ الْمَآءَ الَّذِیْ تَشْرَبُوْنَؕ(۶۸
    ترجمہ: تو بھلا بتاؤ تو وہ پانی جو تم پیتے ہو۔

    ءَاَنْتُمْ اَنْزَلْتُمُوْهُ مِنَ الْمُزْنِ اَمْ نَحْنُ الْمُنْزِلُوْنَ(۶۹
    ترجمہ: کیا تم نے اسے بادلوں سے اتارا یا ہم ہی اتارنے والے ہیں ؟

    لَوْ نَشَآءُ جَعَلْنٰهُ اُجَاجًا فَلَوْ لَا تَشْكُرُوْنَ(۷۰
    ترجمہ: اگر ہم چاہتے تو اسے سخت کھاری کردیتے پھر تم کیوں شکر نہیں کرتے؟

    اَفَرَءَیْتُمُ النَّارَ الَّتِیْ تُوْرُوْنَؕ(۷۱
    ترجمہ: تو بھلا بتاؤ تو وہ آگ جو تم روشن کرتے ہو۔

    ءَاَنْتُمْ اَنْشَاْتُمْ شَجَرَتَهَاۤ اَمْ نَحْنُ الْمُنْشِــٴُـوْنَ(۷۲
    ترجمہ: کیا تم نے اس کادرخت پیدا کیا یا ہم ہی پیدا کرنے والے ہیں ؟

    نَحْنُ جَعَلْنٰهَا تَذْكِرَةً وَّ مَتَاعًا لِّلْمُقْوِیْنَۚ(۷۳
    ترجمہ: ہم نے اسے یادگار بنایا اور جنگل میں سفر کرنے والوں کیلئے نفع بنایا۔

    فَسَبِّحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِیْمِ۠(۷۴
    ترجمہ: تو اے محبوب! تم اپنے عظمت والے رب کے نام کی پاکی بیان کرو۔

    فَلَاۤ اُقْسِمُ بِمَوٰقِعِ النُّجُوْمِۙ(۷۵
    ترجمہ: تو مجھے تاروں کے ڈوبنے کی جگہوں کی قسم۔

    وَ اِنَّهٗ لَقَسَمٌ لَّوْ تَعْلَمُوْنَ عَظِیْمٌۙ(۷۶
    ترجمہ: اور اگرتم سمجھو تو یہ بہت بڑی قسم ہے۔

    اِنَّهٗ لَقُرْاٰنٌ كَرِیْمٌۙ(۷۷
    ترجمہ: بیشک یہ عزت والا قرآن ہے۔

    فِیْ كِتٰبٍ مَّكْنُوْنٍۙ(۷۸
    ترجمہ: پوشیدہ کتاب میں (ہے)۔

    لَّا یَمَسُّهٗۤ اِلَّا الْمُطَهَّرُوْنَؕ(۷۹
    ترجمہ: اسے پاک لوگ ہی چھوتے ہیں ۔

    تَنْزِیْلٌ مِّنْ رَّبِّ الْعٰلَمِیْنَ(۸۰
    ترجمہ: یہ تمام جہانوں کے مالک کا اتارا ہوا ہے ۔

    اَفَبِهٰذَا الْحَدِیْثِ اَنْتُمْ مُّدْهِنُوْنَۙ(۸۱
    ترجمہ: تو کیا تم اس بات میں سستی کرتے ہو؟

    وَ تَجْعَلُوْنَ رِزْقَكُمْ اَنَّكُمْ تُكَذِّبُوْنَ(۸۲
    ترجمہ: اور تم اپنا حصہ یہ بناتے ہو کہ تم جھٹلاتے رہو۔

    فَلَوْ لَاۤ اِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُوْمَۙ(۸۳
    ترجمہ: پھر کیوں نہیں جب جان گلے تک پہنچے۔

    وَ اَنْتُمْ حِیْنَىٕذٍ تَنْظُرُوْنَۙ(۸۴
    ترجمہ: حالانکہ تم اس وقت دیکھ رہے ہو۔

    وَ نَحْنُ اَقْرَبُ اِلَیْهِ مِنْكُمْ وَ لٰكِنْ لَّا تُبْصِرُوْنَ(۸۵
    ترجمہ: اور ہم تم سے زیادہ اس کے قریب ہیں مگر تم دیکھتے نہیں ۔

    فَلَوْ لَاۤ اِنْ كُنْتُمْ غَیْرَ مَدِیْنِیْنَۙ(۸۶
    ترجمہ: تواگر تمہیں بدلہ نہیں دیا جائے گا تو کیوں نہیں ۔

    تَرْجِعُوْنَهَاۤ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِیْنَ(۸۷
    ترجمہ: روح کو لوٹا لیتے ،اگر تم سچے ہو۔

    فَاَمَّاۤ اِنْ كَانَ مِنَ الْمُقَرَّبِیْنَۙ(۸۸
    ترجمہ: پھر وہ فوت ہونے والا اگر مقرب بندوں میں سے ہے۔

    فَرَوْحٌ وَّ رَیْحَانٌ وَّ جَنَّتُ نَعِیْمٍ(۸۹
    ترجمہ: تو راحت اور خوشبودارپھول اور نعمتوں کی جنت ہے۔

    وَ اَمَّاۤ اِنْ كَانَ مِنْ اَصْحٰبِ الْیَمِیْنِۙ(۹۰
    ترجمہ: اور اگر وہ دائیں جانب والوں میں سے ہو۔

    فَسَلٰمٌ لَّكَ مِنْ اَصْحٰبِ الْیَمِیْنِؕ(۹۱
    ترجمہ: تو (اے حبیب!) تم پردائیں جانب والوں کی طرف سے سلام ہو۔

    وَ اَمَّاۤ اِنْ كَانَ مِنَ الْمُكَذِّبِیْنَ الضَّآلِّیْنَۙ(۹۲
    ترجمہ: اور اگرمرنے والا جھٹلانے والوں گمراہوں میں سے ہو۔

    فَنُزُلٌ مِّنْ حَمِیْمٍۙ(۹۳
    ترجمہ: تو کھولتے ہوئے گرم پانی کی مہمانی ۔

    وَّ تَصْلِیَةُ جَحِیْمٍ(۹۴
    ترجمہ: اور بھڑکتی آگ میں داخل کیا جانا ہے۔

    اِنَّ هٰذَا لَهُوَ حَقُّ الْیَقِیْنِۚ(۹۵
    ترجمہ: یہ بیشک اعلیٰ درجہ کی یقینی بات ہے۔

    فَسَبِّحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِیْمِ۠(۹۶
    ترجمہ: تو اے محبوب! تم اپنے عظمت والے رب کے نام کی پاکی بیان کرو۔



    यह भी पढ़ें: - Ayatul Kursi Hindi Mein



    Surah Al Waqiah Arabic Full Images

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    Surah Al Waqiah Arabic Pdf Download


    मेरे प्यारे दीनी भाइयों और बहनों जैसा की आपने ऊपर सूरह वाकिया को अरबी में  उसके उर्दू तर्जुमे के साथ पढ़ा ही होगा. साथ ही साथ आपने Surah Waqia की अराबिक इमेज भी देखी होंगी

    यहाँ हमने Surah Waqiah Arabic Pdf उपलब्ध करायी है आप आसानी के साथ सूरह वाकिया की पीडीऍफ़ को डाउनलोड कर सकते है




    Surah Waqiah in English Transliteration



    Bismillaahir Rahmaanir Raheem
    In the name of Allah, Most Gracious, Most Merciful.

    1.Izaa waqa'atil waaqi'ah
    When the Event (i.e. the Day of Resurrection) befalls.

    2.Laisa liwaq'atihaa kaazibah
    And there can be no denying of its befalling.

    3.Khafidatur raafi'ah
    It will bring low (some); (and others) it will exalt;

    4.Izaa rujjatil ardu rajjaa
    When the earth will be shaken with a terrible shake.

    5.Wa bussatil jibaalu bassaa
    And the mountains will be powdered to dust.

    6.Fakaanat habaaa'am mumbassaa
    So that they will become floating dust particles.

    7.Wa kuntum azwaajan salaasah
    And you (all) will be in three kinds (i.e. separate groups).

    8.Fa as haabul maimanati maaa as haabul maimanah
    So those on the Right Hand (i.e. those who will be given their Records in their right hands), Who will be those on the Right Hand? (As a respect for them, because they will enter Paradise).

    9.Wa as haabul mash'amati maaa as haabul mash'amah
    And those on the Left Hand (i.e. those who will be given their Record in their left hands), Who will be those on the Left Hand? (As a disgrace for them, because they will enter Hell).

    10.Wassaabiqoonas saabiqoon
    And those foremost [(in Islamic Faith of Monotheism and in performing righteous deeds) in the life of this world on the very first call for to embrace Islam,] will be foremost (in Paradise).

    11.Ulaaa'ikal muqarraboon
    These will be those nearest to Allah.

    12.Fee Jannaatin Na'eem
    In the Gardens of delight (Paradise).

    13.Sullatum minal awwaleen
    A multitude of those (foremost) will be from the first generations (who embraced Islam).

    14.Wa qaleelum minal aa khireen
    And a few of those (foremost) will be from the later time (generations).

    15.'Alaa sururim mawdoonah
    (They will be) on thrones woven with gold and precious stones,

    16.Muttaki'eena 'alaihaa mutaqabileen
    Reclining thereon, face to face.

    17.Yatoofu 'alaihim wildaa num mukhalladoon
    They will be served by immortal boys,

    18.Bi akwaabinw wa abaareeq, wa kaasim mim ma'een
    With cups, and jugs, and a glass from the flowing wine,

    19.Laa yusadda'oona 'anhaa wa laa yunzifoon
    Wherefrom they will get neither any aching of the head, nor any intoxication.

    20.Wa faakihatim mimmaa yatakhaiyaroon
    And fruit; that they may choose.

    21.Wa lahmi tairim mimmaa yashtahoon
    And the flesh of fowls that they desire.

    22. Wa hoorun'een
    And (there will be) Houris (fair females) with wide, lovely eyes (as wives for the pious),

    23.Ka amsaalil lu'lu'il maknoon
    Like unto preserved pearls.

    24.Jazaaa'am bimaa kaanoo ya'maloon
    A reward for what they used to do.

    25.Laa yasma'oona feehaa laghwanw wa laa taaseemaa
    No Laghw (dirty, false, evil vain talk) will they hear therein, nor any sinful speech (like backbiting, etc.).

    26.Illaa qeelan salaaman salaamaa
    But only the saying of: Salam!, Salam! (greetings with peace) !

    27.Wa as haabul yameeni maaa as haabul Yameen
    And those on the Right Hand, - Who will be those on the Right Hand?

    28.Fee sidrim makhdood
    (They will be) among thornless lote-trees,

    29.Wa talhim mandood
    Among Talh (banana-trees) with fruits piled one above another,

    30.Wa zillim mamdood
    In shade long-extended,

    31.Wa maaa'im maskoob
    By water flowing constantly,

    32.Wa faakihatin kaseerah
    And fruit in plenty,

    33.Laa maqtoo'atinw wa laa mamnoo'ah
    Whose season is not limited, and their supply will not be cut off,

    34.Wa furushim marfoo'ah
    And on couches or thrones, raised high.

    35.Innaaa anshaanaahunna inshaaa'aa
    Verily, We have created them (maidens) of special creation.

    36.Faja'alnaahunna abkaaraa
    And made them virgins.

    37.'Uruban atraabaa
    Loving (their husbands only), equal in age.

    38.Li as haabil yamen
    For those on the Right Hand.

    39.Sullatum minal awwa leen
    A multitude of those (on the Right Hand) will be from the first generation (who embraced Islam).

    40.Wa sullatum minal aakhireen
    And a multitude of those (on the Right Hand) will be from the later times (generations).

    41.Wa as haabush shimaali maaa as haabush shimaal
    And those on the Left Hand Who will be those on the Left Hand?

    42.Fee samoominw wa hameem
    In fierce hot wind and boiling water,

    43.Wa zillim miny yahmoom
    And shadow of black smoke,

    44.Laa baaridinw wa laa kareem
    (That shadow) neither cool, nor (even) good,

    45.Innahum kaanoo qabla zaalika mutrafeen
    Verily, before that, they indulged in luxury,`

    46.Wa kaanoo yusirroona 'alal hinsil 'azeem
    And were persisting in great sin (joining partners in worship along with Allah, committing murders and other crimes, etc.)

    47.Wa kaanoo yaqooloona a'izaa mitnaa wa kunnaa turaabanw wa izaaman'ainnaa lamab'oosoon
    And they used to say: "When we die and become dust and bones, shall we then indeed be resurrected?

    48.Awa aabaaa'unal awwaloon
    "And also our forefathers?"

    49.Qul innal awwaleena wal aakhireen
    Say (O Muhammad ): "(Yes) verily, those of old, and those of later times.

    50.Lamajmoo'oona ilaa meeqaati yawmim ma'loom
    All will surely be gathered together for appointed Meeting of a known Day.

    51.summa innakum ayyuhad daaalloonal mukazziboon
    Then moreover, verily, you the erring-ones, the deniers (of Resurrection)!

    52.La aakiloona min shaja rim min zaqqoom
    You verily will eat of the trees of Zaqqum.

    53.Famaali'oona minhal butoon
    Then you will fill your bellies therewith,

    54.Fashaariboona 'alaihi minal hameem
    And drink boiling water on top of it,

    55.Fashaariboona shurbal heem
    So you will drink (that) like thirsty camels!"

    56.Haazaa nuzuluhum yawmad deen
    That will be their entertainment on the Day of Recompense!

    57.Nahnu khalaqnaakum falaw laa tusaddiqoon
    We created you, then why do you believe not?

    58.Afara'aytum maa tumnoon
    Then tell Me (about) the human semen that you emit.

    59.'A-antum takhluqoo nahooo am nahnul khaaliqoon
    Is it you who create it (i.e. make this semen into a perfect human being), or are We the Creator?

    60.Nahnu qaddarnaa baina kumul mawta wa maa nahnu bimasbooqeen
    We have decreed death to you all, and We are not unable,

    61.'Alaaa an nubaddila amsaalakum wa nunshi'akum fee maa laa ta'lamoon
    To transfigure you and create you in (forms) that you know not.

    62.Wa laqad 'alimtumun nash atal oolaa falaw laa tazakkaroon
    And indeed, you have already known the first form of creation (i.e. the creation of Adam), why then do you not remember or take heed?

    63.Afara'aytum maa tahrusoon
    Tell Me! The seed that you sow in the ground.

    64.'A-antum tazra'oonahooo am nahnuz zaari'ooon
    Is it you that make it grow, or are We the Grower?

    65.Law nashaaa'u laja'al naahu hutaaman fazaltum tafakkahoon
    Were it Our Will, We could crumble it to dry pieces, and you would be regretful (or left in wonderment).

    66.Innaa lamughramoon
    (Saying): "We are indeed Mughramun (i.e. ruined or lost the money without any profit, or punished by the loss of all that we spend for cultivation, etc.)!

    67.Bal nahnu mahroomoon
    "Nay, but we are deprived!"

    68.Afara'aytumul maaa'allazee tashraboon
    Tell Me! The water that you drink.

    69.'A-antum anzaltumoohu minal muzni am nahnul munziloon
    Is it you who cause it from the rainclouds to come down, or are We the Causer of it to come down?

    70.Law nashaaa'u ja'alnaahu ujaajan falaw laa tashkuroon
    If We willed, We verily could make it salt (and undrinkable), why then do you not give thanks (to Allah)?

    71.Afara'aytumun naaral latee tooroon
    Tell Me! The fire which you kindle,

    72.'A-antum anshaatum shajaratahaaa am nahnul munshi'oon
    Is it you who made the tree thereof to grow, or are We the Grower?

    73. Nahnu ja'alnaahaa tazkira tanw wa mataa'al lilmuqween
    We have made it a Reminder (for the Hell-fire, in the Hereafter); and an article of use for the travellers (and all the others, in this world).

    74.Fasabbih bismi Rabbikal 'azeem
    Then glorify with praises the Name of your Lord, the Greatest.

    75.Falaa uqsimu bimaawaa qi'innujoom
    So I swear by Mawaqi (setting or the mansions, etc.) of the stars (they traverse).

    76.Wa innahoo laqasamul lawta'lamoona'azeem
    And verily, that is indeed a great oath, if you but know.

    77.Innahoo la quraanun kareem
    That (this) is indeed an honourable recital (the Noble Qur'an).

    78.Fee kitaabim maknoon
    In a Book well-guarded (with Allah in the heaven i.e. Al-Lauh Al-Mahfuz).

    79.Laa yamassuhooo illal mutahharoon
    Which (that Book with Allah) none can touch but the purified (i.e. the angels).

    80.Tanzeelum mir Rabbil'aalameen
    A Revelation (this Qur'an) from the Lord of the 'Alamin (mankind, jinns and all that exists).

    81.Afabihaazal hadeesi antum mudhinoon
    Is it such a talk (this Qur'an) that you (disbelievers) deny? 
    82.Wa taj'aloona rizqakum annakum tukazziboon
    And instead (of thanking Allah) for the provision He gives you, on the contrary, you deny Him (by disbelief)!

    83.Falaw laaa izaa balaghatil hulqoom
    Then why do you not (intervene) when (the soul of a dying person) reaches the throat?

    84.Wa antum heena'izin tanzuroon
    And you at the moment are looking on,

    85.Wa nahnu aqrabu ilaihi minkum wa laakil laa tubsiroon
    But We (i.e. Our angels who take the soul) are nearer to him than you, but you see not, [Tafsir At-Tabari, Vol.27, Page 209]

    86.Falaw laaa in kuntum ghaira madeeneen
    Then why do you not, if you are exempt from the reckoning and recompense (punishment, etc.)

    87.Tarji'oonahaaa in kuntum saadiqeen
    Bring back the soul (to its body), if you are truthful?

    88.Fa ammaaa in kaana minal muqarrabeen
    Then, if he (the dying person) be of the Muqarrabun (those brought near to Allah),

    89.Farawhunw wa raihaa nunw wa jannatu na'eem
    (There is for him) rest and provision, and a Garden of delights (Paradise).

    90.Wa ammaaa in kaana min as haabil yamen
    And if he (the dying person) be of those on the Right Hand,

    91.Fasalaamul laka min as haabil yamen
    Then there is safety and peace (from the Punishment of Allah) for (you as you are from) those on the Right Hand.

    92.Wa ammaaa in kaana minal mukazzibeenad daaalleen
    But if he (the dying person) be of the denying (of the Resurrection), the erring (away from the Right Path of Islamic Monotheism),

    93.Fanuzulum min hameem
    Then for him is entertainment with boiling water.

    94.Wa tasliyatu Jaheem
    And burning in Hell-fire.

    95.Inna haaza lahuwa haqqul yaqeen
    Verily, this! This is an absolute Truth with certainty.

    96.Fasabbih bismi rabbikal 'azeem
    So glorify with praises the Name of your Lord, the Most Great.



    यह भी पढ़ें: - Surah Muzammil Pdf Hindi Me



    Surah Al Waqiah English Full Images

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    Surah Al Waqiah English Pdf Download


    मेरे प्यारे दीनी भाइयों और बहनों जैसा की आपने ऊपर सूरह वाकिया को इंग्लिश में उसके इंग्लिश तर्जुमे के साथ पढ़ा ही होगा. साथ ही साथ आपने Surah Waqia की इंग्लिश इमेज भी देखी होंगी.

    यहाँ हमने Surah Waqiah English Pdf उपलब्ध करायी है आप आसानी के साथ सूरह वाकिया की पीडीऍफ़ को डाउनलोड कर सकते है






    Surah Waqiah Benefits in Hindi

    (सूरह वाकिया के फायदे हिंदी में)


    सूरह वाक़िया, इंसान हमेशा सोचता है की उसकी माली हालत सुधर जाये क्योंकि वे गरीबी से डरते हैं। हम में से हर कोई एक अच्छी माली हालत और कर्ज मुक्त जीवन का सपना देखता है।

    दुनिया को हिला देने वाले आर्थिक संकट का असर हमारे इस समाज पर पड़ रहा है और एक भी इंसान इससे हिफाजत में नहीं है

    यहाँ हम सूरह वाकिया पढ़ने के फायदों के बारे में बात करने जा रहे हैं।

    सूरह वाक़िया के फायदे

    सूरह वक़िया एक ऐसी सूरह है जिसमें सभी दुन्याबी फायदे हैं। इसे दौलत की सूरह के रूप में भी जाना जाता है। हमें चाहिए कि हम इस सूरह को अपनी जिन्दगी में उतार लें, इसे अपने दिल के करीब रखें।

    हमारे प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम ने इसे ,बदहाली के खिलाफ मुकम्मल तःफुज़ और दौलत का बहुत बड़ा जरिया करार दिया है। अल्लाह के प्यारे रसूल ने सूरह वाकिया पढ़ने के फवायिद के बारे में कहा:

    प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम ने इरशाद फ़रमाया, "सूरह अल वाकिया दौलत की सूरह है, लिहाज़ा इसे पढ़ो और इसे अपने बच्चों को सिखाओ" [इब्न असकिर]

    सूरह वाक़िया पढ़ने का सबसे अच्छा समय


    आप इस सूरह को अपनी जिन्दगी का हिस्सा आसान बना सकते हैं। इस सूरह को पढ़ने के लिए केवल कुछ मिनटों की जरूरत है। 

    हम कुरान पढ़ने जैसी बेस्किमती चीज पर अपना समय लगाने के बजाय अपना टाइम उन चीजों पर बर्बाद करते हैं जो किसी काम के नहीं हैं।

    सूरह वाकिया पढ़ने का सबसे अच्छा समय सोने से पहले का है। सोने से पहले कुछ समय निकालें और सूरह वाकिया की तिलावत करें।

    जो हमारे प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम की एक बहुत बड़ी सुन्नत है और दौलत का आखिरी जरिया है।

    हमारे प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम भी सूरह वाकिया को पढ़ने के बेहतरीन वक्त के बारे में इरशाद फरमाते हैं:

    पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम ने कहा, "जो कोई रात में सूरह अल वाकिया की तिलावत करता है उसे कभी भी गुरबत का सामना नहीं करना पड़ेगा।" [इब्न सुन्नी 620]

    ग़ुरबत से बचाओ

    सूरह वाक़िया ग़ुरबत से बचाती है क्योंकि हमारे प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम ने फ़रमाया कि उम्मा में कोई भी सख्श ग़ुरबत का स्वाद नहीं चखेगा अगर वह हर रात इस सूरह को पढ़ता है।

    हम आपको सलाह देते है की आप मग़रिब और ईशा के बीच या ईशा के बाद सूरह वाक़िया पढ़ा करें।

    इंशाअल्लाह, अल्लाह आपको बेहतर इनाम अता फरमाएगा।

    कुछ और फायदे हमने नीचे बयां किये है इन इन्हें भी पढ़ें:-

    ♣ दौलत का जरिया: अस्र की नमाज़ के बाद अगर इसे 14 बार पढ़ा जाए तो इसे पढ़ने वाले को भरपूर दौलत की प्राप्ति होती है।

    ♣ अमीर बनने का जरिया: अगर आप इस सूरह को फज्र की नमाज़ के बाद तीन बार और ईशा की नमाज़ के बाद तीन बार पढ़ेंगे, तो इंशा अल्लाह आपकी ग़ुरबत दूर हो जाएगी।

    ♣ कारोबार में बढोतरी: अगर यह सूरह एक ही बार में 41 बार पढ़ी जाए, तो अल्लाह उसके कारोबार को बढ़ा देगा।

    ♣ बीमार व्यक्ति: यदि यह सूरह बीमार व्यक्ति की तरफ पढ़ी जाए तो यह उसे दर्द से हिफाज़त करती है।



    Surah Waqiah Youtube Video with Urdu Translation






    Surah Waqiah Mp3 or Audio File Download


    दोस्तों अगर आपको सुनने का शौक है और आप सुरह वाकिया को सुनना चाहते है तो आप यहाँ से आसानी के साथ Surah Waqiah Mp3 या सूरह वाकिया की ऑडियो फाइल को डाउनलोड कर सकते है

    इसको हमने आपके लिए तर्जुमा के साथ अपलोड किया है जिससे की आप सूरह वाकिया का तर्जुमा भी सुन सकें




    यह भी पढ़ें: - Surah Yaseen ke Fayde 41 Times


    Some Questions and Answers Related to Surah Waqiah



    What is Surah Waqiah good for?

    Ans. Surah Waqiah पूरे मुस्लिम उम्मा के लिए एक नेमत है। सूरह उन लोगों के लिए माली इस्तःकाम  हासिल करने का अच्छा जरिया फराहम करती है जो अपने अल्लाह से हलाल कमाई और इनाम की तलाश करना चाहते हैं।

    Does Surah Waqiah make you rich?

    Ans. सूरह वाकिया को दौलत की सूरह भी कहा जाता है। रात को सोने से पहले सूरह वाकिया पढ़ा करो। जो सख्श हलाल रोज़ी की तलाश करता है, उसे सूरह वाकिया की तिलावत करनी चाहिए। 

    हमारे प्यारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह बसल्लम ने फ़रमाया कि उम्मा में कोई भी सख्श ग़ुरबत का स्वाद नहीं चखेगा अगर वह हर रात इस Surah Waqiah को पढ़ता है।


    मेरे प्यारे दीनी भाईयों और बहनों अगर आपको ये पोस्ट अच्छी लगी हो तो आपसे गुज़ारिश है की आप इस दीनी जानकारी को आगे भी शेयर करें।


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